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Thursday, November 3, 2016

गौवर्धन पूजा दीपोत्सव को ब्रजमंडल में महौत्सव बनाने का पर्व है।


गौवर्धन पूजा-- दीपावली पंच पर्वों का महत्वपूर्ण उत्सव 

देश का सर्वाधिक लोकप्रिय पंच दिवसीय महोत्सव दीपावली दीपोत्सव, दीपपर्व, ज्योतिपर्व आदि नामों से पुकारा जाता है यह पर्व वैसे तो सम्पूर्ण उत्तर भारत का महान पर्व है किन्तु ब्रज मंडल में यह पर्व मानो विशिष्ट  सा बन जाता है।जब दीपावली में महालक्ष्मी माँ के पूजन के दूसरे दिन अर्थात् कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपदा) को पूरे ब्रज मंडल में गोवर्धन पूजन एवं अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

गोवर्धन पूजा किस कारण से की जाती है -----

ब्रज मंडल में तीन प्रसिद्ध पर्वत हैं पहला बरसाना, दूसरा नंदीश्वर (नंदगाँव) एवं तीसरा गोवर्धन। बरसाना पर्वत को ब्रह्मा, नंदीश्वर को शिव तथा गोवर्धन को विष्णु स्वरूप माना जाता है।इन तीनों पर्वतों में श्री गोवर्धन जी ही सर्वा -धिक आस्था के प्रतीक हैं।गोवर्धन पूजा के बारे में यह कहा जाता है कि इंद्र को शिक्षा देने के उद्देश्य से जब भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र पूजा बंद करवा दी और गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरु करा दी तो इंद्र कुपित हो गये और उन्हौने ब्रजमण्डल में मूसलाधार वर्षा शुरु करा दी और इससे सम्पूर्ण ब्रज की रक्षा के लिए ब्रजराज भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उँगली पर उठा लिया था। यह गोवर्धन पूजा भगवान श्री कृष्ण द्वारा शुरु की हुयी गोवर्धन पूजा ही है।
                            कहा जाता है कि गोवर्धन धारण के समय श्रीकृष्ण की आयु मात्र सात वर्ष की थी। तभी से अन्नकूट महोत्सव का प्रारंभ गोवर्धन पूजन के बाद प्रसाद वितरण प्रारंभ हुआ। गोवर्धन को देव स्वरूप मानकर घर-घर में पूजन की परम्परा गोबर से गोवर्धन बनाकर पूर्ण की जाती है।

आखिर प्रतिपल क्यों घट रहा है----गोवर्धन पर्वत

भारतीय वांड्मय में श्री गोवर्धन पर्वत को तीन बार उठाने का उल्लेख मिलता है। पहली बार पुलस्त्य मुनि द्वारा, दूसरी बार हनुमान जी द्वारा और तीसरी बार योगीराज भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इसे उठाया गया। कहते हैं कि द्वापर  युग का विशालकाय पर्वत था किंतु इस समय यह प्रतीक रूप में ही विराजमान है। इसके इस प्रकार से  तिल-तिल घटने की कथा इस प्रकार है।
                   गर्ग संहिता के अनुसार एक बार महर्षि पुलस्त्य देवभूमि उत्तराखंड पहुंचे। साधना के दौरान उन्हें यह अनुभूति हुई कि गोवर्धन की छाया में भजन करने से सिद्धि प्राप्त होती है। वे सीधे गोवर्धन के पिता द्रोणाचल पर्वत के पास पहुंचे एवं भिक्षा में उनके पुत्र गोवर्धन को मांगा। द्रोणाचल ने पुलत्स्य मुनि के डर से न चाहते हुये भी मना नही किया। किंतु गोवर्धन ने एक शर्त रखी कि मैं चलूँगा मगर यदि तुमने मुझे कहीं उतार दिया और जमीन पर रख दिया तो वहीं स्थिर हो जाऊंगा।
पुलस्त्य मुनि यह शर्त मानकर उन्हें उठाकर चल दिए। जैसे ही वह ब्रज में पहुंचे, गोवर्धन को अंत:प्रेरणा हुई कि श्रीकृष्ण लीला के कर्म में उनका यहां होना अनिवार्य है। बस वे अपना वजन बढ़ाने लगे। इधर मुनि को भी लघुशंका का अहसास हुआ। मुनि ने अपने शिष्य को गोवर्धन को साधे रहने का आदेश दिया और निवृत्त होने चले गए। शिष्य ने कुछ पलों बाद ही वजन उठाने में असमर्थता जताते हुए गोवर्धन को वहीं रख दिया वापिस लौटने पर मुनि ने गोवर्धन को उठाना चाहा किंतु गोवर्धन टस से मस नहीं हुए। उसी समय मुनि ने क्षुब्ध मन से गोवर्धन पर्वत को श्राप दे दिया कि तुम तिलतिल कर घटते रहोगे। तब से गोवर्धन तिल-तिल कर घट रहे हैं।
यही कारण है कि द्वापर में तीस हजार मीटर ऊँचा पर्वत अब केवल 5000 साल बाद ही केवल 30 मीटर ऊँचा रह गया है।
इसके अलावा हनुमान जी ने गौवर्धन पर्वत कब उठाया उसके बारे में कथा है कि जब रामेश्वरम में सेतुबंध का काम चल रहा था तब हनुमान जी द्रोणागिरि से गौवर्धन पर्वत का कुछ हिस्सा लेकर आ रहे थे जब वे ब्रज क्षेत्र से गुजर रहे थे तभी उन्हैं देव अनुभूति हुयी कि सेतुबंध का कार्य तो पूर्ण हो चुका है अतः उन्हौने गौवर्धन पर्वत को वहीं स्थापित कर दिया कहा जाता है कि उस समय गोवर्धन को बहुत दुःख हुआ और उन्हौने कहा कि वे भगवान के काम नही आये। हनुमान जी ने भगवान से यह बात बतायी तब भगवान ने कहा कि द्वापर युग में मैं स्वयं उन्हैं धारण करुँगा और अपना स्वरुप उन्हैं प्रदान करुँगा।

गौधन की  पूजा कैसे होती है -----

ब्रज के मंदिरों में अन्नकूट की परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम चावल-हल्दी मिश्रित रोपन से रेखांकन किया जाता है। इसके ऊपर घास का मूठा बनाकर उसे बड़े-बड़े पत्तलों से ढक देते हैं। उसके ऊपर चावलों के कोट से गिरिराज जी की आकृति बनाते हैं। श्री विष्णु भगवान के चारों आयुधों (शंख, चक्र, गदा, पदम) के समान चार बड़े गूझे चारों भुजाओं के रूप में रख दिए जाते हैं। मध्य में बड़ा गोलाकार चंद्रमा बनाते हैं जिसे गिरिराज का शिखर माना जाता है। चावल के कोट पर लंबी तुलसी माला लगाकर केसर से सजाते हैं। एक ओर जल एवं दूसरी ओर घी की हाँडी रखी जाती है। अन्नकूट के रूप में मिष्ठान, दूध, सामग्री, मेवा, भात, दाल, कढ़ी, साग, कंद, रायता, खीर, कचरिया, बड़ा, बड़ी व अचार प्रयोग किया जाता है।

गौ संरक्षण को समर्पित पर्व है गोधन अथवा गौवर्धन --------

वैदिक चिंतन में गौ का बड़ा महत्त्व रहा है। आश्रमों में गाय की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। पंचगव्य का प्रयोग कायाकल्प करने के लिए किया जाता है। इसका उल्लेख आयुर्वेद में भी मिलता है। गाय के गोबर को सम्मान देने की दिशा में ही गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजन की परंपरा ऋषि मुनियों ने प्रारंभ की। यदि वर्तमान पीढ़ी इसके अन्तर्निहित अर्थ को समझ कर इसके व्यवस्थित उपयोग पर ध्यान केंद्रित कर सके, तो यह पर्व अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकेगा।

गोवर्धन पूजा का महत्व                 गिरिराज जी की परिक्रमा                      गोवर्धन आरती                         गोवर्धन पूजा                         govardhan parikrama            गिरिराज जी का मंदिर                         गोवर्धन परिक्रमा मार्ग                 गौवर्धन पर्व                          गौधन पर्व                                      गोवर्धन पूजा विधि



Saturday, October 22, 2016

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जयंती 18 अक्टूबर पर विशेष

सम्राट मिहिर भोज samarat Mihir Bhoj
सम्राट मिहिर भोज

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जयंती 18 अक्टूबर 


जीवन परिचय 
सनातन धर्म रक्षक
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार

(1) सम्राट मिहिरभोज का जन्म विक्रम संवत 873 (816 ईस्वी) को हुआ था। आपको कई नाम से जाना जाता है जैसे भोजराज, भोजदेव , मिहिर , आदिवराह एवं प्रभास।

(2) आपका राज्याभिषेक विक्रम संवत 893 यानी 18 अक्टूबर दिन बुधवार 836 ईस्वी में 20 वर्ष की आयु में हुआ था। और इसी दिन 18 अक्टूबर को ही हर वर्ष भारत में आपकी जयंती मनाई जाती है।

(3) इनके दादा का नाम नागभट्ट द्वितीय था उनका स्वर्गवास विक्रम संवत 890 (833 ईस्वी) भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को हुआ। इनके पिता का नाम रामभद्र और माता का नाम अप्पादेवी था। माता पिता ने सूर्य की उपासना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें मिहिरभोज के रुप मे पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

(4) सम्राट मिहिरभोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था। जो भाटी राजपूत वंश की थी। इनके पुत्र का नाम महेन्द्रपाल प्रतिहार था जो सम्राट मिहिरभोज के स्वर्गवास उपरांत कन्नौज की गद्दी पर बैठे।

(5) विक्रम संवत 945 (888 ईस्वी) 72 वर्ष की आयु में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का स्वर्गवास हुआ।

मिहिर भोज का साम्राज्य < --------


(1) सम्राट मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुल्तान से पश्चिम बंगाल और कश्मीर से उत्तर महाराष्ट्र तक था।

(2) सम्राट मिहिरभोज गुणी बलवान , न्यायप्रिय , सनातन धर्म रक्षक , प्रजा हितैषी एवं राष्ट्र रक्षक थे।

(3) सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे। और उन्होंने मलेच्छों (अरब, मुगल, कुषाण, हूण) से पृथ्वी की रक्षा की थी। उन्हें वराह यानी भगवान विष्णु का अवतार भी बताया गया है। उनके द्वारा चलाये गये सिक्कों पर वराह की आकृति बनी हुई है।

(4) अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिला - उत - तारिका 851 ईस्वी में लिखी। वह लिखता है की सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार (परिहार) के पास उंटो, घोडों व हाथियों की बडी विशाल एवं सर्वश्रेष्ठ सेना है। उनके राज्य में व्यापार सोने व चांदी के सिक्कों से होता है। उनके राज्य में सोने व चांदी की खाने भी है। इनके राज्य में चोरों डाकुओं का भय नही है। भारत वर्ष में मिहिरभोज प्रतिहार से बडा इस्लाम का अन्य कोई शत्रु नहीं है। मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण के राष्ट्रकूटों के राज्य , पूर्व में बंगाल के शासक पालवंश और पश्चिम में मुल्तान के मुस्लिम शासकों से मिली हुई है।

------> मिहिरभोज की सेना < -------


(1) सम्राट मिहिरभोज के पूर्वज नागभट्ट प्रथम (730 - 760 ईस्वी) ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा जो सर्व प्रथम चलाई , वो मिहिरभोज के समय और पक्की होई गई थी।

(2) विक्रम संवत 972 (915 ईस्वी) में भारत भ्रमण आये बगदाद के इतिहासकार अलमसूदी ने अपनी किताब मिराजुल - जहाब में इस महाशक्तिशाली , महापराक्रमी सेना का विवरण किया है। उसने इस सेना की संख्या लाखों में बताई है। जो चारो दिशाओं में लाखो की संख्या में रहती है।

(3) प्रसिद्ध इतिहासकार के. एम. मुंशी ने सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की तुलना गुप्तवंशीय सम्राट समुद्रगुप्त और मौर्यवंशीय सम्राट चंद्रगुप्त से इस प्रकार की है। वे लिखते हैं कि सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार इन सभी से बहुत महान थे। क्योंकि तत्कालीन भारतीय धर्म एवं संस्कृति के लिए जो चुनौती अरब के इस्लामिक विजेताओं की फौजों द्वारा प्रस्तुत की गई। वह समुद्रगुप्त , चंद्रगुप्त आदि के समय पेश नही हुई थी और न ही उनका मुकाबला अरबों जैसे अत्यंत प्रबल शत्रुओं से हुआ था।

(4) भारत के इतिहास में मिहिरभोज से बडा आज तक कोई भी सनातन धर्म रक्षक एवं राष्ट्र रक्षक नही हुआ।

एक ऐसा हिंदू क्षत्रिय योद्धा , अरबों का सबसे बडा दुश्मन जिसने लगभग 40 युद्घ कर अरबों को भारत से पलायन करने पर मजबूर कर दिया एवं सनातन धर्म की रक्षा की, ऐसे थे महान चक्रवर्ती सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जिसने भारत पर 50 वर्ष शासन किया।

सम्राट मिहिर भोज का वृहद इतिहास =====

एक ऐसा राजा जिसने अरब तुर्क आक्रमणकारियों को भागने पर विवश कर दिया और जिसके युग में भारत सोने की चिड़िया कहलाया। मित्रों परिहार क्षत्रिय वंश के नवमीं शताब्दी में सम्राट मिहिरभोज भारत का सबसे महान शासक था। उसका साम्राज्य आकार, व्यवस्था , प्रशासन और नागरिको की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चक्रवर्ती गुप्त सम्राटो के समकक्ष सर्वोत्कृष्ट था।

भारतीय संस्कृति के शत्रु म्लेछो यानि मुस्लिम तुर्को -अरबो को पराजित ही नहीं किया अपितु उन्हें इतना भयाक्रांत कर दिया था की वे आगे आने वाली एक शताब्दी तक भारत की और आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं कर सके।

चुम्बकीय व्यक्तित्व संपन्न सम्राट मिहिर भोज की बड़ी बड़ी भुजाये एवं विशाल नेत्र लोगों में सहज ही प्रभाव एवं आकर्षण पैदा करते थे। वह महान धार्मिक , प्रबल पराक्रमी , प्रतापी , राजनीति निपुण , महान कूटनीतिज्ञ , उच्च संगठक सुयोग्य प्रशासक , लोककल्याणरंजक तथा भारतीय संस्कृति का निष्ठावान शासक था।

ऐसा राजा जिसका साम्राज्य संसार में सबसे शक्तिशाली था। इनके साम्राज्य में चोर डाकुओ का कोई भय नहीं था। सुदृढ़ व्यवस्था व आर्थिक सम्पन्नता इतनी थी कि विदेशियो ने भारत को सोने की चिड़िया कहा।

यह जानकर अफ़सोस होता है की ऐसे अतुलित शक्ति , शौर्य एवं समानता के धनी मिहिरभोज को भारतीय इतिहास की किताबो में स्थान नहीं मिला।
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासनकाल में सर्वाधिक अरबी मुस्लिम लेखक भारत भ्रमण के लिए आये और लौटकर उन्होंने भारतीय संस्कृति सभ्यता आध्यात्मिक-दार्शनिक ज्ञान विज्ञानं , आयुर्वेद , सहिष्णु , सार्वभौमिक समरस जीवन दर्शन को अरब जगत सहित यूनान और यूरोप तक प्रचारित किया।

क्या आप जानते हे की सम्राट मिहिरभोज ऐसा शासक था जिसने आधे से अधिक विश्व को अपनी तलवार के जोर पर अधिकृत कर लेने वाले ऐसे अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भारत की धरती पर पाँव नहीं रखने दिया , उनके सम्मुख सुदृढ़ दीवार बनकर खड़े हो गए। उसकी शक्ति और प्रतिरोध से इतने भयाक्रांत हो गए की उन्हें छिपाने के लिए जगह ढूंढना कठिन हो गया था। ऐसा किसी भारतीय लेखक ने नहीं बल्कि मुस्लिम इतिहासकारो बिलादुरी सलमान एवं अलमसूदी ने लिखा है। ऐसे महान सम्राट मिहिरभोज ने 836 ई से 885 ई तक लगभग 50 वर्षो के सुदीर्घ काल तक शासन किया।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जी का जन्म सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में रामभद्र प्रतिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है। मिहिरभोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इनके शासन काल की हमे जानकारी वराह ताम्रशासन पत्र से मालूम पडती है जिसकी तिथि (कार्तिक सुदि 5, वि.सं. 893 बुधवार) 18 अक्टूबर 836 ईस्वी है। इसी दिन इनका राजतिलक हुआ था।

मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक ओर कश्मीर से कर्नाटक तक था। सम्राट मिहिरभोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक थे। मिहिरभोज शिव शक्ति एवं भगवती के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है।

प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की।

50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो की मुद्रा थी उसको सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। सम्राट मिहिरभोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी।

सम्राट मिहिरभोज का नाम आदिवाराह भी है। जिस प्रकार वाराह (विष्णु) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज मलेच्छों(अरबों, हूणों, कुषाणों)को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की एवं सनातन धर्म के रक्षक बने।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की जयंती हर वर्ष 18 अक्टूबर को मनाई जाती है जिन स्थानों पर परिहारों, पडिहारों, इंदा, राघव, लूलावत, देवल, रामावत,मडाडो अन्य शाखाओं को सम्राट मिहिरभोज के जन्मदिवस का पता है वे इस जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं। जिन भाईयों को इसकी जानकारी नहीं है आप उन लोगों के इसकी जानकारी दें और सम्राट मिहिरभोज का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने की प्रथा चालू करें।

अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिरभोज का यशोगान अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है कि प्रतिहार सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं है। मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार, सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यह भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी हैं।यह राज्य भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है। इसमें डाकू और चोरों का भय नहीं है।

मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राष्ट्रकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है। शत्रु उनकी क्रोध अग्नि में आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे। धर्मात्मा, साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे। उनके दरबार में राजशेखर कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की।

कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिरभोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था। उन पर अंकुश रखने के लिए दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।

किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठाने की हिम्मत नहीं होती थी। उनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रतिहार ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार राजपूत साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता था।।

* आइये जानते है हिन्दू क्षत्रिय शौर्य और बहादुरी से जुड़े सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार" के रोचक पहलू *

मिहिर भोज को काव्यों एवं इतिहास मे इन विशेषणो से वर्णित किया ====


क्षत्रिय सम्राट,भोजदेव, भोजराज, वाराहवतार, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, महानतम भोज, मिहिर महान।

मिहिर भोज का शासनकाल ====


सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने 18 अक्टूबर 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 50 साल तक राज किया। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था।

मिहिर भोज का  साम्राज्य ====


परिहार वंश ने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। प्रतिहारों ने अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्यचकित किया है। भारत देश हमेशा ही प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है। प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, अरबों, हूणों, से देश को बचाए रखा और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।

इनका राजशाही निशान वराह है। ठीक उसी समय मुश्लिम धर्म का जन्म हुआ और इनके प्रतिरोध के कारण ही उन्हे हिंदुस्तान मे अपना राज कायम करने मे 300 साल लग गए। और इनके राजशाही निशान " वराह " विष्णु का अवतार माना है प्रतिहार मुसलमानों  के कट्टर शत्रु थे । इसलिए वो इनके राजशाही निशान 'बराह' से आजतक नफरत करते है।

मिहिर भोज की शासन व्यवस्था==


सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार वीरता, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं। उन्होंने विदेशी साम्राज्यो के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी पूरी जिन्दगी अपनी मलेच्छो से पृथ्वी की रक्षा करने मे बिता दी। सम्राट मिहिरभोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक सम्राट थे। सिंहासन पर बैठते ही मिहिरभोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार राजपूत साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे 'सम्राट' मिहिरभोज प्रतिहार की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे कई महान विशेषणों से वर्णित किया गया है।

सम्राट मिहिर भोज को वराह उपाधि क्यो मिली ====


सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे यह मुख्य कारण हैं

1. जिस प्रकार वाराह (विष्णु जी) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। इसीलिए इनहे आदिवाराह की उपाधि दी गई है।

सम्राट मिहिर भोज भगवान शिव व शक्ति के उपासक ====


सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिरभोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50 वर्ष तक राज करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो कन्नौज की मुद्रा था उसको सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था।

सम्राट मिहिर भोज की धन व्यवस्था ====


सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। इनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।

मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी। भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।

==== विश्व की सुगठित और विशालतम सेना ====

मिहिरभोज प्रतिहार की सैना में 8,00,000 से ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन बैस के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिरभोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।

==== बचपन से ही बहादुर और निडरता ====

मिहिरभोज प्रतिहार बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे।एक बालक होने के बावजूद, देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए उन्होंने युद्धकला और शस्त्रविधा में कठिन प्रशिक्षण लिया। राजकुमारों में सबसे प्रतापी प्रतिभाशाली और मजबूत होने के कारण, पूरा राजवंश और विदेशी आक्रमणो के समय देश के अन्य राजवंश भी उनसे बहुत उम्मीद रखते थे और देश के बाकी वंशवह उस भरोसे पर खरे उतरने वाले थे।

==== वह वैध उत्तराधिकारी साबित हुए ====

मिहिरभोज प्रतिहार राजपूत साम्राज्य के सबसे प्रतापी सम्राट हुए उनके राजगद्दी पर बैठते ही जैसे देश की हवा ही बदल गई । मिहिरभोज की वीरता के किस्से पूरी दूनीया मे मशूहर हुए।विदेशी आक्रमणो के समय भी लोग अपने काम मे निडर लगे रहते है। गद्दी पर बैठते ही उन्होने देश के लुटेरे,शोषण करने वाले, गरीबो को सताने वालो का चुन चुनकर सफाया कर दिया। उनके समय मे खुले घरो मे भी चोरी नही होती थी।

#==== अरबी लेखो मे मिहिरभोज का है यशोगान ====#


* अरब यात्री सुलेमान - पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं :
जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिरभोज के बारे में लिखता है कि इस सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिरभोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं था । मिहिरभोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। ये भी कहा जाता है।कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी।

#बगदाद का निवासी अल मसूदी 915ई.-916ई का सम्राट मिहिर भोज के बारे में कथन#


वह कहता है कि (जुज्र) प्रतिहार साम्राज्य में 1,80,000 गांव, नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे तथा यह दो किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात लाख से नौ लाख सैनिक थे। उत्तर की सेना लेकर वह मुलतान के बादशाह और दूसरे मुसलमानों के विरूद्घ युद्घ लड़ता है। उसकी घुड़सवार सेना देश भर में प्रसिद्घ थी।जिस समय अल मसूदी भारत आया था उस समय मिहिरभोज तो स्वर्ग सिधार चुके थे परंतु प्रतिहार शक्ति के विषय में अल मसूदी का उपरोक्त विवरण मिहिरभोज के प्रताप से खड़े साम्राज्य की ओर संकेत करते हुए अंतत: स्वतंत्रता संघर्ष के इसी स्मारक पर फूल चढ़ाता सा प्रतीत होता है। समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था,क्योंकि प्रतिहार राजपूत राजाओं ने 11 वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवर्त का महान सम्राट कहा जाता था।


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Thursday, October 6, 2016

भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में हिंगला नदी के पास देवी हिंगलाज माता का मंद‌िर है जो शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है।  हिंगलाज देवी के विषय में ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि जो एक बार माता हिंगलाज के दर्शन कर लेता है उसे पूर्वजन्म के कर्मों का दंड नहीं भुगतना पड़ता है।  मान्यता है कि परशुराम जी द्वारा 21 बार क्षत्रियों का अंत किए जाने पर बचे हुए क्षत्रियों ने माता हिंगलाज से प्राण रक्षा की प्रार्थना की थी। माता ने क्षत्रियों को ब्रह्मक्षत्रिय बना दिया इससे परशुराम से इन्हें अभय दान मिल गया। यहां माता के भक्त उसी प्रकार देवी की पूजा करते हैं जैसे भारत में माता के भक्त वैष्‍णो देवी की पूजा करते हैं। लेक‌िन यहां भक्तों की संख्या कम रहती है।

Wednesday, October 5, 2016

बांग्ला देश की राजधानी ढाका में है सती माता का वह प्रसिद्ध मंदिर जहाँ सती के आभूषण गिरे थे

बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका में माता का एक मंदिर है ज‌िसे ढाकेश्वरी देवी के नाम से जाना जाता है। इन्हीं देवी के नाम से इस शहर का नाम ढ़ाका पड़ा है।  भारत के विभाजन से पहले यह भारत का प्रमुख मंदिर माना जाता था।इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में सेन राजवंश के राजा बल्लाल सेन ने करवाया था। इस देवी मंदिर की गिनती शक्तिपीठ के रूप में की जाती है। इसके पीछे कथा यह है कि यहां पर देवी सती के आभूषण गिरे थे। नवरात्र के द‌िनों में माता के इस मंद‌‌िर में भक्तों की लंबी कतार लगती है क्योंक‌ि भक्त मानते हैं यहां मांगी गई मुरादें पूरी होती हैं। बांग्लादेश की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ढाकेश्वरी देवी के दर्शन क‌िए थे।

अफगानिस्तान जैसे पूर्णतः इस्लामिक देश में अभी भी है माँ के मन्दिर - माँ आसामाई का मन्दिर तथा पंजसीर के योगी की शिला (मुसलमान भी पूजते है जिसे)

भारत में माता के मंद‌िर आपको हर गली मुहल्ले में म‌िल जाएंगे इसमें आपको कुछ अचंभा नहीं होगा। लेक‌िन मुसलमानों के देश में जहां मूर्त‌ियों की पूजा करने वालों को काफ‌िर कहा जाता है उस जगह पर माता का मंद‌िर होना आपको हैरान जरूर करेगा। इस पर भी जब आप यह जानेंगे क‌ि मंद‌िर सद‌ियों पुराना है और इनके चमत्कार को मुसलमान भी मानते हैं तो खुद ब खुद कह उठेंगे जय माता दी। तो आइये देखें मुसलमानों के देश में माता का मंद‌िर जहां भक्त हर द‌िन करते हैं पूजा अर्चना।

अफगानिस्तान एक इस्लामिक देश माना जाता है। इस देश की राजधानी काबुल में माता का एक मंदिर स्थित है। यह मंदिर आसामाई के मंदिर के नाम से जाना जाता है। आसामाई के विषय में यह माना जाता है कि यह उम्मीद और आसपूर्ण करने वाली देवी हैं जो आसा पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर निवास करती हैं।





माता के इस मंदिर में कई हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। इस मंदिर के पास एक बड़ी सी शिला है जिसे पंजसीर का जोगी कहा जाता है। इस जोगी की कथा यह है कि करीब 150 साल पहले यह इस स्थान पर तपस्या करने आया था। स्थानीय लोगों ने जब इन्हें परेशान किया तब यह एक शिला के रूप में परिवर्तित हो गया। इसके बाद से यह शिला 'पंजसीर का जोगी' के नाम से जाना जाने लगा।




Tuesday, October 4, 2016

मंदिर जहाँ होती है योनि की पूजा,

ये मंदिर आसम के गोवाहाटी  से 10 किलो मीटर दूर नीलांचल नामक पहाड़ी पर स्थित है आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन आपको बतादू की इस मंदिर में लोग यौनि की पूजा करते है अब आप सोच रहे होंगे की भला किसी मंदिर में यौनि की पूजा कैसे हो सकती है लेकिन ये सच है जी हां यहाँ यौनि की ही पूजा होती है इस मंदिर के पीछे बड़ी रोचक कहानी है !

जब सती के पिता ने अपनी पुत्री और उसके पति शंकर को यज्ञ में अपमानित किया था और भगवान् शिव को पूरा भला कहा था इस बात से सती बहुत दुखी हुई हुई और उसी समय यज्ञ की जलती हुई अग्नि में कूद कर अपनी जान दे दी उसके बाद भगवान् शिव को गुस्सा आया और उन्होंने शती के शव को उठा कर तांडव नृत्य किया था  और इस शव को लेकर इधर उधर विचरने लगे तब भगवान विष्णु ने  भगवान शिव का मोह विनाश करने हेतु माँ पराम्बा सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिये और ये सभी दुकड़े अलग अलग जगह पर जाकर गिरे थे  उन्हीं में से गुवाहाटी के पास कामाख्या में माँ की योनि वाला हिस्सा गिरा और वहाँ एक शक्ति पीठ स्थापित हो गया आज तक वहाँ योनि ही स्थित है जिसकी पूजा होती है।इस मंदिर में यौनि के आकर का एक कुंड है जिसमे से जल निकलता रहता है इस कुंड के ऊपर एक लाल कपड़ा होता है जिससे उसको ढक देते है और इसके ऊपर कुछ फूल भी डाल देते है !

इस मंदिर में हर साल एक मेले का आयोजन किया जाता है और इस मेले का नाम है अम्बुबाजी मेला  इस मेले में दूर दूर के तांत्रिक और अघोरी हिस्सा लेते है इस मेले में एक चमत्कार होता है वैसे तो यहाँ यौनि से पानी निकलता रहता है लेकिन मेले के तीन दिन यहाँ इस यौनि से खून निकलता है इस मेले को कामरूप का कुम्भ कहा जाता है यहाँ इस मेले के आलावा और भी कई ऐसे महीने है जिनमे यहाँ पूजा की जाती है !



इस मंदिर में और भी कई ऐसे छोटे छोटे मंदिर है जिनमे महीनों के हिसाब से पूजा की जाती है यहाँ पाँच मंदिर तो भगवान् शिव के हैं और तीन मंदिर भगवान् बिष्णु के हैंा ये मंदिर काफी साल पुराने हैं यहाँ दुर्गा पूजा, अम्बुबाजी पूजा ऐसी कई पूजाए की जाती है जिनमे यहाँ यौनि की पूजा को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है 

माँ दुर्गा का वह भयंकर रुप जिसे शांत करने के लिए भगवान शंकर को भी चरणों में लोटना पड़ा।


आपने कई कथाओ और पुराणों को पढ़ा होगा लेकिन आज में आपको एक ऐसी शक्ति के बारे में बता रहा हूँ जिसका सामना करने से समय काल भी डरता है इससे युद्ध करने से भगवान शिव भी घबरा गये  फिर भगवान् शिव को इसके पैरो में गिरना पड़ा दुनिया में इस शक्ति का कोई भी सामना नही कर सकता इस शक्ति को लोग माँ काली के नाम से जानते है जाने इसके बारे में कि इन्हैं  काली क्यों कहा जाता है।
माँ काली के काले और डराबने रूप की उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी  दुनिया की ये मात्र एक ऐसी शक्ति है जिनसे समय अर्थात काल भी भय खाता है काली माँ का क्रोध इतना भयंकर है कि संसार की सारी शक्तियाँ मिलकर भी इसके क्रोध को रोक नही पाती है एक बार इनके क्रोध को रोकने के लिए उनके पति भगवान् शंकर को भी उनके कदमो में लेटना पड़ा लेकिन फिर भी उनका क्रोध शांत नही हुआ।

एक बार रक्तबीज नाम के एक दैत्य ने कठोर तपस्या से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि   उसके शरीर से एक बूँद रक्त गिरते ही उससे हजारो दैत्य पैदा हो जाएगे लेकिन कुछ  ही दिनों के बाद इसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगो को सताने हेतु करना शरू कर दिया धीरे धीरे उसने तीनो लोकों  में अपने नाम का डंका बजा दिया और देवताओ को युद्ध के लिए ललकारने लगा देवताओ ने इससे युद्ध करते समय अपनी पूरी शक्ति लगा दी लेकिन वह इसे हरा नही सके क्योंकि इसके शरीर से एक बूँद खून की गिरते ही हजारो दैत्य पैदा हो जाते थे ।
देवता भयभीत हो गए उन्होंने तुरंत माँ दुर्गा  की सहायता लेने का विचार बनाया, सभी ने मिलकर माँ दुर्गा के पास आकर प्रार्थना की तब माँ दुर्गा  युद्ध भूमि में दैत्य का सामना करने के लिए टूट पड़ीं माँ दुर्गा ने राक्षसो को मारना शुरू किया लैकिन रक्तबीज को नही मार पा रहीं थीं क्योंकि रक्तबीज के रक्त की एक बूंद धरती पर गिरते है हजारो रक्तबीज पैदा होजाते थे।तब दुर्गा माँ ने महाकाली का भयंकर रुप प्रकट किया जो माँ दुर्गा के सुन्दर रूप के स्थान पर एक डरावना स्वरुप है महाकाली ने देवताओ की रक्षा करने के लिये यह बिकराल रूप धारण कर लिया और उसके बाद माँ काली ने अपनी जीभ का विस्तार किया अब दानबो का खून धरती पर गिरने के बजाय उनकी जीभ पर गिरने लगा इस तरह वो दानबो को मारती चली गईं कोई भी दानव शेष नही बचा और अंत में महाकाली ने रक्तजीब को भी मार दिया। लेकिन इस बीच महा काली का गुस्सा इतना भयंकर रूप ले चुका था की उन्हें शांत करना नामुमकिन था उनके पास जाने से सारे देवता डरने लगे  उसके बाद सभी देवता मिलकर भोले शंकर के पास गए और उनसे माँ काली के गुस्से को शांत करने की प्रार्थना की,भगवान् शिव ने देवताओ की बात मान ली और उसके बाद बो माँ काली के गुस्से को शांत करने के लिए निकल पड़े उन्होंने सारे प्रयास कर लिए लेकिन माँ काली का गुस्सा जब शांत नही हुआ क्योंकि उनके मार्ग में जो भी आ रहा था माँ उसी का संहार कर रहीं थी जब कुछ भी उपाय नही बचा तो भोले शंकर उनके चरणों  में जाकर लेट गए और जब माँ काली उनके ऊपर चढ़ती चली गईं और जब गर्दन तक पहुँच कर टकराईं तो  उन्हें वास्तविकता समझ आई इस प्रकार खुद को भगवान शंकर के ऊपर चढ़ा देख माँ काली की जीभ बाहर आ गई इस प्रकार माँ का गुस्सा शांत हुआ।  


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